आदर्शवाद और इंसान
आदर्शवाद महज एक शब्द नहीं वल्कि खुद मे एक जीती जागती परिपाटी है जिसका निर्माण प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को निर्वाह करने के लिए करता है | अब कोई भी व्यक्ति ये समझ सकता है कि आदर्शवाद का संबंध किसी भी व्यक्ति के रहन - सहन , उसके खान - पान या उसके जीवनशैली से होगा | परन्तु ये पूर्ण सत्य का एक मात्र एक हिस्सा भी नहीं है |
आदर्शवाद एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा हमें सदा से ही किसी भी नीति का उल्लंघन करने से रोकती रही है | पर वास्तव मे आदर्शवाद है क्या और इसका किसी भी इंसान के जीवन से अंतत सम्बन्ध आखिर है क्या ?
दरअसल आदर्शवाद होती है एक सीमा जो प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए निर्धारित करता है और इसी सीमा के आधीन होता है उसका पूरा जीवन - उसके आचार, उसके विचार | यह आदर्शवाद रूपी सीमा व्यक्ति खुद ही अपने लिए निर्धारित करता है जिसका सम्बन्ध उसके परिवार तथा उसके जीवन की किसी भौतिक वस्तु से नहीं होता है और ना ही संसार की कोई भी भौतिक वस्तु उस व्यक्ति के आदर्शवाद को किसी भी रूप से प्रभावित कर सकती है |
किसी भी व्यक्ति का आदर्शवाद उसकी विवश्ता नहीं होती है अपितु उसकी मर्यादा होती है जो उसके जीवन मे आने वाली हर परिस्थिति से उसका रक्षण करने मे सक्षम होती है |
सुरभि गुप्ता