Saturday, July 25, 2020

                                                          आदर्शवाद और इंसान 



आदर्शवाद एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा हमें सदा से ही किसी भी नीति का उल्लंघन करने से रोकती रही है |  पर वास्तव मे आदर्शवाद है क्या और इसका किसी भी इंसान के जीवन से अंतत सम्बन्ध आखिर है क्या ?

आदर्शवाद महज एक शब्द नहीं वल्कि खुद मे एक जीती जागती परिपाटी है जिसका निर्माण  प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को निर्वाह करने के लिए करता है | अब कोई भी व्यक्ति ये समझ सकता है कि आदर्शवाद का संबंध किसी भी व्यक्ति के रहन - सहन , उसके खान - पान या उसके जीवनशैली से होगा | परन्तु ये पूर्ण सत्य का एक मात्र एक हिस्सा भी नहीं है | 

दरअसल आदर्शवाद होती है एक सीमा जो प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए निर्धारित करता है और इसी सीमा के आधीन होता है उसका पूरा जीवन - उसके आचार, उसके विचार | यह आदर्शवाद रूपी सीमा व्यक्ति खुद ही अपने लिए निर्धारित करता है जिसका सम्बन्ध उसके परिवार तथा उसके जीवन की किसी भौतिक वस्तु से नहीं होता है  और ना ही संसार की कोई भी भौतिक वस्तु उस व्यक्ति के आदर्शवाद को किसी भी रूप से प्रभावित कर सकती है | 

किसी भी व्यक्ति का आदर्शवाद उसकी विवश्ता नहीं होती है अपितु उसकी मर्यादा होती है जो उसके जीवन मे आने वाली हर परिस्थिति से उसका रक्षण करने मे सक्षम होती है |



सुरभि गुप्ता 



Thursday, May 28, 2020

  ढलता सूरज और सृजन 




 मुझे हमेशा से ढलते सूरज को देखना बहुत पसंद है और हैरानी भी होती है कि कैसे वो दिन भर की तपन को अपने अंदर समेट कर भी इतना शांत रह लेता है | और ना केवल शांत रहता है बल्कि दुनिया की किसी भी सुन्दर वस्तु से भी अधिक सुन्दर दिखता है | फिर एकाएक अपनी सारी सुंदरता को अपनी बाहों मे समेटता हुआ शांत होने लगता है एक नयी यात्रा पर जाने के लिए | 
अब यात्रा है तो कहीं तो अंत होगा ही और अंत हमेशा आरम्भ ही लाता है| इस यात्रा का अंत होता है सृजन |  पर क्या सृजन इतना आसान होता है नहीं | सृजन तक पहुँचने के लिए सूरज को गुजरना पड़ता है एक काली गहरी रात से| पर ये रात चाँद और उसकी चाँदनी से भरी ना होकर पूरणतय लबालब भरी होती है संघर्ष और कभी ना हारने वाले जुनून से | यह संघर्ष ना जाने कितने सपनों और उम्मीदों का आधार  होता है और जिस वक्त यह संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर होता है उसी समय सृजन जन्म लेता है|यही सृजन लाता है एक नया सूरज जो भरा होता है नए कल से  | 
तो यदि कभी जीवन की तपन सताए, ढल जाइए सूरज की तरह सृजन की यात्रा पर | और याद रखिए यात्रा कहीं ना कहीं पहुँचाती जरूर है |

ढलता सूरज देता है पैगाम नया 
हर बार सृजन का बीज नया वो लाएगा || 



सुरभि गुप्ता 

Wednesday, May 20, 2020

 अंतता प्रेम तो हम खुद से ही करते हैं 




मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त है जो शायद मेरी पहली ऐसी हमउम्र मित्र है जिसके साथ मेरे विचार पूर्णता मिलते है | अभी कुछ दिनों से मोहतरमा अपने करियर और परिवार को लेकर थोड़ा परेशान थी कल अचानक उन से बात हुई तो उन्होंने बताया कि अब उन्हें  उनकी समस्याओ का समाधान मिल चूका है तो  मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया कि  क्या समाधान मिला तो वह बोलीं  कि यदि जीवन मे करियर बनाने के बाद कुछ बन पायी तो परिवार को गर्ब होगा मुझ पर | मैंने भी अपनी सहमति व्यक्त की परन्तु एक तंज के साथ कि चुना तो आपने खुद को ही | अब वह मित्र ठहरी तो कुछ बोल भी नहीं सकती | 

सत्य यह ही है कि जब चुनाब अपने या अपनों मे से किसी एक का करना होता है तो प्रत्येक व्यक्ति खुद को ही चुनता है | कितनी विडम्वना है ना प्रेम हम खुद से करते है परन्तु ताउम्र ना जाने कितने रिश्तों को भ्रम मे रखते हैं कि हम उनसे प्रेम करतें हैं | और यदि मोहवश कोई व्यक्ति अपनी जगह अपने अपनों का चुनाब करता है तो वह उस रिश्ते मे भी अपने लिए ही प्रेम ढूढ़ता है | यदि वह व्यक्ति प्रेम पाने मे असमर्थ रहता है तो स्वतः वह खुद अपने सम्बन्ध को तोड़  देता है | और खुद से प्रेम करना कोई अपराध नहीं बल्कि जो व्यक्ति खुद से प्रेम नहीं कर सकता वह हमेशा दूसरों को प्रेम देने मे असमर्थ ही रहेगा | 



सुरभि गुप्ता 




Wednesday, May 13, 2020

कलम दुःख हरना भी जानती है 



बचपन से मेरी माँ मुघसे कहती है कि बेटा कलम की ताकत का अंदाजा लगाना असंभब है |  इस कथन से शायद वो मुघे बताना चाहती है कि कलम इस संसार मे सबसे ज्यादा ताकतवर होती है | उनका कहना कितने प्रतिशत सत्य है यह तो मुघे भी नहीं पता | परन्तु मेरे जीवन मे कलम का किरदार थोड़ा अलग है |  मेरे लिए कलम का मतलब है रामबाण औषधि | 

अब आपको आश्चर्य होगा कि भला साधारण सी दिखने वाली एक कलम रामबाण औषधि कैसे हो सकती  है ?  कलम रामबाण औषधि कैसे होती है इसे समझने से पहले हमें रामबाण औषधि को समझना होगा | जैसा कि हम सभी जानते हैं कि रामबाण औषधि ही एक मात्र ऐसी औषधि है  जो किसी भी व्यक्ति के सभी शारीरिक कष्ट  हरने मे समर्थ होती है | पर तनिक विचार कीजिये कि क्या हमें सिर्फ शारीरिक कष्ट ही होता है हमारे मानसिक कष्टों का क्या ?

 अब यदि कोई कष्ट है तो निवारण भी तो होना ही चाहिए | पर  जिस प्रकार कष्ट अलग अलग है, उनके उपचारो का अलग होना भी  स्वाभाविक है | तन का दुःख जाता है कुछ ग्रहण करने से पर मन का दुःख जाता है व्यक्त करने से | अब प्रश्न यह कि है कि अपना दुःख किससे व्यक्त किया जाए तो विचार कीजिये क्या आपके जीवन मे आपका आपसे अच्छा कोई साथी है यदि नहीं तो उठा लीजिये कलम और बना लीजिये उसे अपनी  रामबाण औषधि और इसी  औषधि के सहारे अपने सारे दुःखों को व्यक्त कर दीजिये एक कागज पर और अपने मन को पहले की ही तरह भर लीजिये एक नई  उम्मीद से | क्योंकि उम्मीदें कभी हारा नहीं करती | 



सुरभि गुप्ता   

Thursday, May 7, 2020

 किताबे जीवन-सारथी ही  होती हैं 


अभी कुछ दिनों पहले मेरी  एक friend का message आया कि lock-down मे time pass करना बहुत मुश्किल हो रहा है|  तो बड़ी ही सहजता से जबाब मे मैंने  कहा की  कुछ पढ़ लो जिस पर उसने बड़ी ही आपत्ति के साथ कहा की मेरी पढाई पूरी हो चुकी है और अब आगे पढ़ने का मेरा कोई विचार नहीं है | 

कितनी अजीब विचारधारा है  ना हम सब मे से एक बड़ा वर्ग अपने जीवन मे किताबो को बस अपनी स्कूली  शिक्षा  तक ही सीमित देता है |  पर क्यों ? इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि हमे ऐसा लगता है कि किताबे बस स्कूली  शिक्षा ही देने मे समर्थ है | यह मानना और सोचना दोनों ही पूर्ण रूप से गलत है क्योकि किताबे ना केवल स्कूली  शिक्षा देने मे समर्थ है अपितु जीवन शिक्षा देने मे भी उतनी ही सक्षम है |  यह किताबे किसी भी प्रकार की हो सकती है जैसे किसी प्रतियोगी परीक्षा की कोई किताब या कोई उपनन्यास या फिर कोई रेसिपी बुक | 

अब सवाल यह भी सकता है कि किताबो को इतनी महत्ता आखिर दी ही क्यों जाए | क्योकि किताबे हमारे जीवन मे सारथी की ही तरह होती है जो हमारे ज्ञान को बड़ाकर इस जीवन'के रथ को चलाने मे हमारी मदद करती हैं | ना केवल जीवन रथ चलाने मे हमारी मदद करती है बल्कि decision making मे भी हमारी मदद करती है |  अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की किताबो का चयन करते है अपना जीवन सारथी बनाने के लिए | किताबो का चयन भी अहम् भूमिका रखता है क्योकि जैसा जीवन सारथी होगा जीवन भी अंतत वैसा ही होगा | 

तो बिना वक्त गवाए उठा लीजिए कोई किताब अपनी रूचि अनुरूप और बना लीजिए उसे अपना जीवन सारथी| क्योकि जितनी भूमिका जीवन मे जीवनसाथी की होती है उतनी ही महत्ता जीवनसारथी की भी होती है | 


सुरभि गुप्ता 










Saturday, April 25, 2020

"डूबना अच्छा है पर खुद मे"




मेरे इंजीनियरिंग के दौरान मैंने एक subject पढ़ा था "Human Values and Professional Ethics" जो मुझे तब बिल्कुल भी समझ नहीं आया था | परन्तु उस subject मे एक शब्द था "Self-Exploration" जिसका हिंदी अर्थ होता है "खुद को जानो "| मेरी नासमझी के कारण शायद मैं इस शब्द को भी नहीं समझ पायी थी|

परन्तु आज जब सम्पूर्ण विश्व इस कोरोना नामक महामारी से संघर्षरत है तो मुझे लगता है कि यह सबसे उचित समय है इस शब्द को समझने का | मेरे विचार से  खुद को जानने के लिए हमारा खुद के साथ रहना बहुत जरुरी है | हम सभी जीवन भर ना जाने कितने रिश्तों मे उलझे रहते है पर कभी खुद के साथ कोई रिश्ता नहीं बना पाते परन्तु  क्यों ? थोड़ा आश्चर्यजनक कथन लगता है ना यह | 

अगर आज इस आधुनिक और सभ्य समाज मे हमें कोई व्यक्ति खुद से बात करते हुए दिख जाता है तो हम उसके प्रति नकारात्मक विचारधारा बना लेते है पर क्यों ? खुद से बात करना कोई पाप है क्या ? किसी भी रिश्ते का आधार होता है संवाद | तो विषय जब खुद के साथ जुड़ने का आए तो खुद के साथ संवाद उसी प्रकार जरुरी है जिस प्रकार' जीवन मे ऑक्सीजन | और यदि  किसी भी रिश्ते मे एक बार पूर्ण रूप से संवाद स्थापित  हो जाता है तो वो रिश्ता अपना भविष्य खुद बना लेता है | 

आज तक हम सभी ने ना जाने कितने रिश्ते जाने -अनजाने बनाए होंगे और ना जाने उन रिश्तो को निभाने मे कितना संघर्ष किया होगा पर फिर भी अंतता यह रिश्ते हमें  निराशा ही देते हैं | आज जब हम सभी nationwide lock-down के कारण अपने busy schedule से थोड़ा दूर है तो  क्यों ना इस समय मे खुद के साथ एक संवाद स्थापित कर अपने जीवन के सबसे मधुर रिश्ते  जन्म दिया जाए और यकीनन यह रिश्ता आपको कभी निराश नहीं करेगा |  यह खुद के साथ खुद का रिश्ता ही आपको अपने आप से मिला देगा | 


सुरभि गुप्ता 

Monday, March 30, 2020


मनमीत कौन?




आमतौर पर हम सबने अपने जन्म से ही सुना होता है कि  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसे जीवन व्यतीत करने के लिए जीवन के हर पड़ाव पर किसी ना किसी रिश्ते की जरुरत होती है |  यह  रिश्ते हमारी मूलभूत' आवशयकता होते है| ना केवल यह हमारी जरुरत होते है अपितु जीवन भर हमारा पोषण और रक्षण भी करते है|  
पर प्रश्न यह है कि क्या यह सभी रिश्ते हमारे मनमीत होते है इसका उत्तर  है  नहीं| यह उत्तर मन मे द्वन्द उत्पन्न करता है कि जो  रिश्ते हमारा जीवन भर पोषण करते है वो मनमीत क्यों नहीं होते | और यदि यह रिश्ते मनमीत नहीं होते तो मनमीत कौन होते है | 

सर्वप्रथम हमें यह जानना होगा कि मनमीत आखिर होते  कौन है ? किस दुनिया मे पाए जाते हैं इस प्रजाति  लोग ? तो इसका उत्तर बहुत ही साधारण है मनमीत वही जो मन पढ़ ले | शब्दो की इस कोलाहल भरी दुनिया मे जो आपकी ख़ामोशी पढ़ ले वह व्यक्ति है मनमीत | जो समक्ष है वह सब देखते है पर सच्चा मनमीत वही जो आपके उस रूप को पहचानता हो जिसे आपके कोई ना जानता हो| 

साथ चलने वाला साथी हो सकता है पर मनमीत नहीं|  मनमीत तो वह  जो आपके नेत्र मे छुपे अश्रु को पहचान सके, जो आपके चेहरे के बसंत और पतघड को भली- भाँति समझ सके| यह मनमीत आपके जीवन का कोई  भी रिश्ता हो सकता है आपके माता -पिता, आपके गुरुजन, आपके मित्र, या कोई और| व्यक्ति या रिश्ता कोई भी परन्तु बंधन अटूट होना चाहिए आपके साथ | 

तो खोजिये अपने मनमीत को और समय रहते अपने संबंध को और प्रगाढ़ बना लीजिये क्युकि जीवन  का क्या पता कल हो ना हो | 


"इस भीड़ भरी दुनिया मे, मनमीत कहाँ पाती हूँ ?"


                                                                                                                                   सुरभि गुप्ता 

                                                           आदर्शवाद और इंसान  आदर्शवाद एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा हमें सदा से ही किस...